Doha 03


॥ श्रीराम ॥

मूल (दोहा) –

पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप॥

शब्दार्थ – पवन तनय – पवन के पुत्र। सुर भूप – देवताओं के राजा।

अर्थ – हे पवन के पुत्र, समस्त संकटों को हरनेवाले मङ्गल मूर्तिरूप समस्त देवताओं के अधिष्ठान स्वरूप श्रीहनुमान जी महाराज। आप श्रीराम, श्रीलक्ष्मण एवं माँ मैथिली के साथ हमारे हृदय में निवास करें।

व्याख्या – चार विशेषण देकर श्रीहनुमान जी को ही मन बुद्धि अहंकार एवं चित्त को शुद्ध करने में सहायक सिद्ध करते हैं एवं पश्चात् राम लक्ष्मण एवं सीताजी के सहित हृदय में विश्राम करने की प्रार्थना करके सर्वतोभावेन श्रीमन्मारुति के ही श्रीचरणकमलकी शरणागतिको ही परम पुरुषार्थ बताकर ग्रन्थ को विश्राम दे रहे हैं।


सुमिरि राम सिय चरन कमल गुरु पद रज शिर धरि।
चौद्वार उत्कल थल मारुतसुतहि ध्यान करि।
संवत नभ फल ख दृग सुमाधव शिव शनिवारा।
शुक्ल दूज हनुमान चालीसा मति अनुसारा।
जुगुति शास्त्र सिद्धान्तमय वैष्णव रीति भगति भरी।
नाम महावीरी ललित लघु व्याख्या गिरिधर करी॥

॥ श्रीहनुमते नमः ॥