Doha 02


॥ श्रीराम ॥

मूल (दोहा) –

बुद्धिहीन तनु जानिकै सुमिरौं पवनकुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेश बिकार॥

शब्दार्थ – बिकार – दोष।

अर्थ – अपने शरीर को बुद्धि से हीन जानकर मैं श्रीपवनपुत्र हनुमान जी का स्मरण कर रहा हूँ। हे प्रभो। आप मुझे बल, बुद्धि तथा विद्या प्रदान करें तथा क्लेश एवं विकारों को समाप्त कर दें।

व्याख्या – बुद्धि शब्द भगवत्सेवोपयोगिनी बुद्धि का वाचक है तथा तनु सूक्ष्म शरीर का। क्योंकि बुद्धि को सूक्ष्म शरीर का अवयव माना गया है। अर्थात् मेरी बुद्धि तमोगुण के आधिक्य से भगवान् के श्रीचरण-कमलों से विमुख हो गई है, अतः पवनपुत्र का स्मरण करता हूँ। पवन शब्द का अर्थ है पवित्र करने वाला। यथा पुनाति इति पवनः। आप उनके पुत्र अर्थात् अग्नि हैं तथा वायोरग्निः (तै.उ. २-१-१) इसलिए अग्निवत् बुद्धि में परम प्रकाश का आधान करके क्लेश आदि मलों को ध्वस्त कर दें। अब हनुमान जी से तीन वस्तुओं की याचना करते हैं –

(१) बल – यहाँ कामरागविवर्जित आत्मबल परक है यथा बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् (भ.गी. ७-११)। यही आत्मबल भगवत्प्राप्ति में साधन है यथा नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः (मु.उ. ३-२-४)।

(२) बुद्धि – यहाँ ईश्वर प्रपन्न बुद्धि अभिप्रेत है। यथा चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि (रा.च.मा. ३-४)।

(३) विद्या – यहाँ विद्या विनयसम्पन्ना अपेक्षित है। जो भगवत्सम्बन्ध का विवेक उत्पन्न करके जीव को राघव के चरण कमल से जोड़ दे यथा सा विद्या या विमुक्तये (वि.पु. १-१९-४१)।

बिद्या बिनु बिबेक उपजाए। श्रम फल किए पढ़े अरु पाए॥

– रा.च.मा. ३-२१-९

अर्थात् श्रीआञ्जनेय बल, बुद्धि एवं अध्यात्म विद्या से भगवान् के सौन्दर्य, ऐश्वर्य एवं माधुर्य की अनुभूति का सामर्थ्य दें।

क्लेश पाँच होते हैं – अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश (मरण)। अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेशाः (यो.सू. २-३)। विकार छः कहे जाते हैं – काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं मात्सर्य। यथा षट विकार जित अनघ अकामा (रा.च.मा. ३-४७-७)। इस प्रकार पञ्च क्लेश षट् विकारों का योग ग्यारह (११) हुआ और आप एकादशरुद्रमय हैं। यथा रुद्र अवतार संसार पाता (वि.प. २५-३)। अतः मेरे इन एकादश शत्रुओं को समाप्त करें।