Doha 01


॥ श्रीराम ॥

मूल (दोहा) –

श्री गुरु चरन सरोज रज निज मन मुकुर सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जस जो दायक फल चारि॥

शब्दार्थ – मुकुर – दर्पण।

अर्थ – श्रीगुरुदेवजी के श्रीचरणकमल की परागरूप धूलि से अपने मन-रूप-दर्पण को स्वच्छ करके रघुकुल में श्रेष्ठ श्रीरामभद्रजू के निर्मल यश का वर्णन कर रहा हूँ, जो चारों फलों को देने वाला है।

व्याख्या – सनातन धर्म के अलंकारभूत परम पावन स्तोत्र रत्न श्रीहनुमानचालीसा की रचना का प्रारम्भ करते हुए कलिपावनावतार निखिलवैष्णवकुलशेखर सारस्वतसार्वभौम परमरामभक्त प्रातःस्मरणीय कविकुलतिलक पूज्य श्रीगोस्वामी तुलसीदास महाराज प्रतिज्ञा वाक्य में सर्वप्रथम श्रीपद के प्रयोग से श्रीजी का स्मरण कर रहे हैं जो समस्त मङ्गलों की खान हैं –

बाम भाग शोभति अनुकूला। आदिशक्ति छबिनिधि जगमूला॥

– रा.च.मा. १-१४८-२

यही श्रीजनक महाराज के यशोवर्धन हेतु श्रीमिथिला भूमि में प्रकट होती हैं तथा श्रीसीता रूपसे श्रीरामभद्रजू के वाम भाग में विराजमान होकर जीव के भगवत्प्रातिकूल्य को निरस्त करती हैं। श्रीशब्द का गुरु शब्द से दो प्रकार का समास है –

(१) मध्यमपदलोपितृतीयातत्पुरुषसमास श्रिया अनुगृहीतो गुरुः इति श्रीगुरुः। अर्थात् श्रीजी के द्वारा अनुगृहीत गुरुदेव। अभिप्राय यह है कि श्रीसम्प्रदाय में दीक्षित गुरुदेव की ही चरण-धूलि से मन की निर्मलता सम्भव है। क्योंकि श्रीजी की कृपा के बिना अविद्याकृत दोष नष्ट नहीं होते। तात्पर्य यह है कि श्रीजी को गोस्वामीजी ने भगवदभिन्न होने पर भी भक्तिरूप में स्वीकारा है। यथा –

लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचन्द।
ग्यान सभा जनु तनु धरे भगति सच्चिदानन्द॥

– रा.च.मा. २-२३९

(२) कर्मधारय श्रीरेव गुरुः इति श्रीगुरुः। अर्थात् श्री ही गुरु हैं। श्रीसम्प्रदाय में श्रीरामानुजाचार्य तथा श्रीरामानन्दाचार्यजी ने श्रीजी को ही परमगुरु माना है। अन्य आर्ष ग्रन्थों में श्रीसीता भगवती को श्रीहनुमानजी की आचार्या के रूप में स्वीकारा गया है। यथा समस्तनिगमाचार्यं सीताशिष्यं गुरोर्गुरुम्। अर्थात् श्रीहनुमान जी श्रीसीताजी के शिष्य तथा देवगुरु बृहस्पतिजी के भी गुरु हैं। अतः श्री हनुमानजी की सन्तुष्टि के लिए प्रणीत श्रीहनुमानचालीसा के प्रारम्भ में उनकी आचार्या श्रीसीताजी का स्मरण अत्यन्त उपयोगी है, यही श्री गुरु शब्द का अभिप्राय प्रतीत होता है। रज शब्द यहाँ श्लेषके बल से कमल पक्ष में पराग एवं चरण पक्ष में धूलि रूप अर्थ का द्योतक है। मनको मुकुर कहने का अभिप्राय यह है कि जैसे दर्पण में बिम्बका प्रतिबिम्बन होता है उसी प्रकार मन में श्रीभुवनमनोहर श्रीराघव के रूप का प्रतिबिम्बन होता है, पर वह विषय रूप काई (जलका मल) से मलिन हो चुका है। यथा काई बिषय मुकुर मन लागी (रा.च.मा. १-११५-१)। अतः उसे श्रीगुरुदेव के चरण-कमल की पराग जैसी मृदु धूलि से स्वच्छ करके पुनः श्रीराम जी के यश-वर्णन की प्रतिज्ञा करते हैं जिससे स्वच्छ मन दर्पण में भली-भाँति उस यशश्चन्द्र का प्रतिबिम्बन हो सके।

श्रीहनुमानचालीसा के प्रारम्भ में रघुवर बिमल जस बरनउँ यह वाक्यखण्ड एक जिज्ञासा का केन्द्र बन जाता है, तथा कुछ सामान्य मस्तिष्क वालों को असंगत प्रतीत होता है। पर विचार करने पर इसका सुगमतया समाधान हो जाता है। श्रीहनुमानजी महाराज श्रीरामभद्रजू के सर्वतोभावेन समर्पित भक्तों में अग्रणी हैं। श्रीरघुनाथ जी के अतिरिक्त वे अपना किञ्चित् भी अस्तित्व मानने को तैयार नहीं है। यथा –

ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई॥

– रा.च.मा. ४-३-३

अतः श्रीरघुवर-यश-वर्णन में ही उनके यश का वर्णन गतार्थ हो जाता है। दूसरी बात यह भी है कि वैष्णव भक्तों को अपनी प्रशंसा नहीं भाती। अतः रघुवर-यश-वर्णन से ही श्रीहनुमान जी की प्रसन्नता सम्भव है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर श्रीगोस्वामी जी ने अभिधावृत्ति से श्रीरामजी के यश का वर्णन कर श्रीहनुमान-चालीसा से श्रीमारुति को प्रसन्न किया तथा रघुवर-यश-भङ्गिमा से लक्षणावृत्ति द्वारा श्रीहनुमत्-यशोगान कर इस हनुमानचालीसा स्तोत्र को श्रीराघव की प्रसन्नता का केन्द्र बना दिया। अतः रघुवर जस बरनउँ से उपक्रम करके राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप से उपसंहार करेंगे। यह रामयश अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष – इन चारों फलों का प्रदाता है। भाव यह है कि इससे प्रसन्न होकर हनुमानजी महाराज श्रीहनुमानचालीसा के पाठक को पुरुषार्थ चतुष्टय दे डालते हैं यद्वा सालोक्य, सामीप्य, सायुज्य, सारूप्य इन चारों मुक्तिफलों को देते हैं अथवा धर्म, ज्ञान, योग, जप इन चारों फलों को देते हैं। किंवा ज्ञानवादियों को साधन चतुष्टय से सम्पन्न कर देते हैं।