Chaupai 40


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥ ४० ॥

शब्दार्थ – हरि चेरा – श्रीराम जी के सेवक।

अर्थ – हे कीशनाथ श्रीहनुमान जी महाराज। आप निरन्तर भगवान् श्रीराम के कैंकर्य में निरत रहते हैं अतः उसी कृपालुतावश तुलसीदास के हृदय में निवास कीजिए। यद्वा गोस्वामी जी कहते हैं कि आञ्जनेय, आप निरन्तर भगवद्भक्त के हृदय में निवास कीजिए। अथवा मैं तुलसीदास निरन्तर हरि अर्थात् वानरश्रेष्ठ आपश्री का सदैव दास हूँ, हे नाथ आप मेरे हृदय में श्रीराम-लक्ष्मण-सीता सहित निवास कीजिए।

व्याख्या – अन्त में गोस्वामी जी अपने हृदय में निवास करने के लिए किंवा वैष्णवजनों के लिए हनुमान जी से प्रार्थना करते हैं। हरि चेरा शब्द का नाथ, हृदय तथा तुलसीदास शब्द से अन्वय करने पर उपर्युक्त तीनों अर्थ संगत हो जाते हैं अर्थात् नाथ सदा हरि चेरा तुलसीदास हृदय महँ डेरा कीजै इस अन्वय से प्रथम अर्थ तथा तुलसीदास नाथ हरि चेरा हृदय महँ सदा डेरा कीजै इस अन्वयसे द्वितीय अर्थ की पुष्टि हो जाती है। यहाँ तुलसीदास शब्द के साथ कहत इस बाहरी क्रिया को जोड़ना पड़ता है जैसे अन्यत्र। यथा शरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल (रा.च.मा. २-२२६)।

[१] दूसरे अर्थ में – जालस्थल सम्पादक।

[२] तुलसीदास सदा हरि चेरा नाथ हृदय महँ डेरा कीजै इस अन्वयसे तृतीय अर्थ की पुष्टि होती है – जालस्थल सम्पादक।