Chaupai 37


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥ ३७ ॥

शब्दार्थ – गोसाईं – इन्द्रियों के स्वामी।

अर्थ – हे गोसाईं हनुमान जी महाराज आपकी जय हो, जय हो, जय हो।आप गुरुदेव की भाँति वात्सल्य पूर्ण कृपा करें।

व्याख्या – हनुमानजी सच्चिदानन्द हैं इसलिए गोस्वामीजी तीन बार जय शब्द का प्रयोग करते हैं। प्रथम जय से हनुमानचालीसा ग्रन्थ का उपक्रम किया था। पुनः जय से उपसंहार करके उनसे कृपा की याञ्चा कर रहे हैं अर्थात् कठोर कृपा न करें। जीव पर दो ही कृपा कर सकते हैं गुरु एवं गोविन्द। गोविन्द की कृपा में कठोरता के साथ कोमलता होती है जैसे असुरों के निग्रह में। किन्तु गुरुकृपा निरन्तर कोमलता से ओत-प्रोत रहती है। यथा –

एक शूल मोहि बिसर न काऊ। गुरु कर कोमल शील सुभाऊ॥

– रा.च.मा. ७-११०-२

अतः प्रभो। गुरुदेव की भाँति कृपा करके आप मुझे श्रीराम प्रेम का ज्ञान करायें।