Chaupai 35


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्व सुख करई॥ ३५ ॥

शब्दार्थ – सर्वसुख- लौकिक एवं पारलौकिक अनुकूलता।

अर्थ – जो भक्त किसी अन्य देवता को अपने चित्त में न धारण कर केवल हनुमान जी की सेवा करता है वह समस्त सुखों को प्राप्त कर लेता है। यद्वा जो अन्य किसी देवता को अपने चित्त में नहीं धारण करता वह भी हनुमान जी की सेवा करके समस्त सुखों की प्राप्ति कर लेता है।

व्याख्या – देवता विमुख को नास्तिक कहा जाता है तथा उसे सुख की प्राप्ति नहीं होती क्योंकि इष्ट भोगों को देने वाले देवता ही हैं। यथा इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः (भ.गी. ३-१२)। पर वह भी हनुमत्कृपा से सर्वसुख का अधिकारी हो सकता है क्योंकि समस्त देव उन्हीं की कृपा की अपेक्षा रखते हैं। यथा देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ बापुरे बराक कहा और राजा राँकको (ह.बा. १२)। अथवा अनन्य निष्ठासे से सेवा करने पर हनुमान जी समस्त सुख प्रदान करते हैं।