Chaupai 34


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥ ३४ ॥

शब्दार्थ – रघुबर पुर – श्रीसाकेतलोक।

अर्थ – हे राम-दूत। आपके भजन के प्रताप से वह साधक इसी भौतिक शरीर से भगवान् श्रीरामभद्र का दर्शन करके शरीरावसान (अन्तकाल) के समय श्रीसाकेत लोक जाकर पुनः मर्त्यलोक में जहाँ भी जन्म लेता है वहाँ श्रीहरि का भक्त ही कहलाता है। अर्थात् पुनर्जन्म में भी उसके भक्ति के संस्कार धूमिल नहीं होते।

व्याख्या – इसी शरीर से साधक इसी लोक में इन्हीं चक्षुओं से श्रीरामजू के कोटि-कोटि कन्दर्प दर्प दलन सगुण साकार नीलनीरधरश्याम लोकाभिराम श्रीविग्रह का दर्शन करता है और अन्तकाल में वह मोक्ष नहीं चाहता। क्योंकि – सगुनोपासक मोक्ष न लेहीं (रा.च.मा. ६-११२-७)। फिर प्रारब्ध का क्षय करके शरीर को विसर्जित कर अपनी इच्छानुसार श्रीसाकेत लोक में विश्राम कर पुनः भगवल्लीलारस की अनुभूति की लालसा से भगवान् श्रीराघव के अवतार काल में संसार में आकर किसी भाग्यशालिनी माँ की कोख को पवित्र कर रघुनाथ जी की प्रतीक्षा में निरत रहता है। यथा –

निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।
सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोक्ष सुख त्यागि॥

– रा.च.मा. ४-२६