Chaupai 33


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥ ३३ ॥

शब्दार्थ – भजन – सेवा, शरणागति।

अर्थ – हे कपि-कुल-तिलक। आप के भजन से साधक श्रीरामभद्रजू को पा जाता है और प्रभु को पाकर वह अनेक जन्मों के दुखों को भूल जाता है।

व्याख्या – आपका भजन भगवत्प्राप्तिमें साधन है क्योंकि भगवद्भक्ति दर्शन के लिए ज्ञान-वैराग्य इन दो नेत्रों की आवश्यकता होती है। यथा ज्ञान विराग नयन उरगारी (रा.च.मा. ७-१२०-१४)। और आप स्वयं ज्ञान वैराग्य रूप हैं। यथा ज्ञानिनामग्रगण्यम् (रा.च.मा. सु.का. मं.श्लो. ३), बिरागी पवनकुमार सो (क. ५-१)। अतः आञ्जनेय के भजन से निश्चित श्रीरामरूप की प्राप्ति हो जाती है। राघव सुख-सिन्धु हैं अतः उन्हें प्राप्त कर व्यक्ति अनेक जन्मों के दुखों को उन्हीं आनन्द-सिन्धु की एक लहर में विलीन कर देता है जैसे जटायु निरखि राम छबिधाम मुख बिगत भई सब पीर (रा.च.मा. ३-३०)।