Chaupai 32


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

राम रसायन तुम्हरे पासा। सादर हो रघुपति के दासा॥ ३२ ॥

शब्दार्थ – राम रसायन – श्रीराम रसका भाण्डागार (भण्डार)।

अर्थ – हे पवन नन्दन। राम प्रेमरस का भण्डार आपके ही पास है एवं आप निरन्तर आदरपूर्वक रघुपति श्रीरामभद्रजू के दास्य भाव में रहते हैं। यद्वा हे आदरणीय रघुपति श्रीरामभद्रजू के दास हनुमान जी आपके पास रामप्रेमरस का भवन अर्थात् राघवचरित्र निरन्तर निवास करता है।

व्याख्या – श्रीहनुमानजी रामभक्ति रस के आचार्य ही हैं। अत एव इन्होंने श्री राघव से अनपायनी भक्ति माँगी –

नाथ भगति तव अति सुखदायिनि। देहु कृपा करि सो अनपायनि॥

– रा.च.मा. ५-३४-३

इन्हें गोस्वामीजी ने रसायनी शब्द से सम्बोधित किया है। यथा राम के रजाइतें रसाइनी समीर सुनु (क. ५-२५)।

[१] बहुप्रचलित प्रति में सदा रहो पाठ मिलता है। गुरुदेव द्वारा सम्पादित श्रीहनुमानचालीसा के प्रामाणिक संस्करण में सादर हो पाठ है – जालस्थल सम्पादक।