Chaupai 31


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता॥ ३१ ॥

शब्दार्थ – दाता – देने वाले।

अर्थ – आप अष्ट सिद्धियों एवं नव निधियों के देने वाले हैं। जनक नन्दिनी श्रीसीता माता ने आपको ऐसा वरदान दिया है।

व्याख्या – अशोकवाटिका में जब श्री आञ्जनेय के वाक्यचातुर्य से माँ मैथिली भलीभाँति संतुष्ट हो गयीं तब इन्होंने आञ्जनेय को आशीर्वाद पुष्पों से विभूषित कर दिया। यहाँ माया की सीता अविद्या अथवा विद्या रूप में नहीं हैं अपितु श्रीराघवकी लीला शक्ति ही माया सीता के रूप में वर्तमान हैं अन्यथा माया के मिथ्यात्व से आञ्जनेय को दिए हुए आशीर्वाद भी प्रामाणिक न हो पायेंगे। इस प्रसङ्ग का सङ्केत भावी किसी ग्रन्थ में किया जाएगा। अथ प्रकृतमनुसरामः। यथा –

आशिष दीन्ह राम प्रिय जाना। होहु तात बल शील निधाना॥
अजर अमर गुन निधि सुत होहू। करहु बहुत रघुनायक छोहू॥
करिहिं कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥

– रा.च.मा. ५-१७-२,३,४

सिद्धियाँ आठ हैं –

अणिमा गरिमा चैव महिमा लघिमा तथा।
प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं चाष्ट सिद्धयः॥

– अ.को. १-१

अर्थात् अणिमा, गरिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व आदि। निधियाँ नौ हैं – महापद्म, पद्म, शङ्ख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील और खर्व आदि। यथा

महापद्मञ्च, पद्मञ्च शङ्खो मकरकच्छपौ।
मुकुन्दः कुन्दनीलौ च खर्वश्च निधयो नव॥

– अ.को. १-११