Chaupai 29


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥ २९ ॥

शब्दार्थ – उजियारा – उजेला।

अर्थ – हे प्रभो। आपका प्रताप कृतयुग, त्रेता, द्वापर एवं कलियुग इन चारों युगों में प्रसिद्ध है। इससे जगत में उजेला छाया हुआ है।

व्याख्या – श्रीराम सार्वकालिक हैं। अतः प्राकट्य के पहले स्वायम्भुव मन्वन्तरके कृतयुग में मनु शतरूपा को द्विभुज रूप में ही दर्शन दिया। यथा –

भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिशि सीता सोई॥

– रा.च.मा. १-१४८-४

उसी प्रकार उनका नाम भी चारों युगों में प्रसिद्ध है। यथा चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ (रा.च.मा.१-२२-८)। अतः कृतयुग में प्रह्लाद भी रामनाम जपते थे। यथा राम कहाँ सब ठौर है खम्भ में हाँ सुनि हाँक नृकेहरि जागे (क. ७-१२८)। प्रह्लाद दैत्य बालकों से स्वयं कहते हैं कि –

रामनामजपतां कुतो भयं सर्वतापशमनैकभेषजम्।
पश्य तात मम गात्रसन्निधौ पावकोऽपि सलिलायतेऽधुना॥


तद्वत् श्रीराम जी के परिकर श्रीहनुमान जी भी चारों युगों में रहते हैं। वैवस्वत मन्वन्तरके २४वें त्रेता के अन्त में प्रभु का प्राकट्य हुआ। पश्चात् आञ्जनेय को तब तक के लिए अमरत्व प्रदान किया जब तक श्रीराम कथा का प्रवाह धराधाम पर अक्षुण्ण रहे। यथा –

चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका।
तावत्ते भविता कीर्तिः शरीरेऽप्यसवस्तथा॥

– वा.रा. ७-४०-२०

भगवान् ने कहा जब तक मेरी कथा इहलोक में रहेगी तब तक तुम्हारी यह कीर्ति एवं तुम्हारे शरीर के प्राण रहेंगे। अतः उस समय से अद्यावधि श्रीराम-कथा के साथ आञ्जनेय का स्वास्थ्य रहना सुस्पष्ट है। यह २८वाँ कलियुग है। प्रभु के प्राकट्य से आज तक चार चतुर्युगियाँ बीत ही गयीं। अतः हनुमान जीके अमरत्व में किमपि सन्देह नहीं है।

प्रताप की उपमा सूर्य से दी जाती है। यथा प्रभु प्रताप रवि छबिहिं न हरही (रा.च.मा. २-२०९-३)। इसलिए इससे जगतमें उजाला कहना उचित है।