Chaupai 23


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनौं लोक हाँक ते काँपे॥ २३ ॥

शब्दार्थ – सम्हारो – स्मरण करें।

अर्थ – हे प्रभो जब आप अपने तेज को स्मरण कर लेते हैं तब आपकी हाँक से ही त्रैलोक्य कंपित हो उठता है।

व्याख्या – सम्हारो शब्द का अर्थ है स्मरण। यथा दीन दयाल बिरद संभारी (रा.च.मा. ५-२७-४)। क्योंकि ऋषियों के शाप से इन्हें अपना तेज विस्मृत रहता है। इसलिए जाम्बवान् को स्मरण दिलाना पड़ा। यथा –

कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम पाहीं॥

– रा.च.मा. ४-३०-५

अतः आज भी भक्त लोग विरुदावली गाकर हनुमान जी के तेज का उद्बोधन करते हैं। इनकी हाँक का वर्णन कवितावली लंकाकाण्ड में इस प्रकार है –

मत्तभट मुकुट दशकंध साहस सइल सृङ्ग बिद्दरनि जनु बज्र टाँकी।
दसन धरि धरनि चिक्करत दिग्गज कमठ शेष संकुचित संकित पिनाकी।
चलित महि मेरु उच्छलित सागर सकल बिकल बिधि बधिर दिसि बिदिसि झाँकी।
रजनिचर धरनिधर गर्भ अर्भक स्रवत सुनत हनुमान की हाँक बाँकी॥

– क. ६-४४