Chaupai 21


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥ २१ ॥

शब्दार्थ – पैसारे – प्रवेश।

अर्थ – हे अंजनीपुत्र। आप श्रीरामभद्रजू के राजद्वार के रक्षक प्रतिहार द्वारपाल हैं। आपकी आज्ञा के बिना किसी का भी श्रीरामजी के परमधाम में प्रवेश नहीं हो सकता।

व्याख्या – श्रीरामोपासना में श्रीहनुमान जी की कृपा परम उपादेय है क्योंकि यही राजाधिराज के जागरूक द्वारपाल हैं। इनकी प्रतिकूलता में जीव को श्रीराघव का आनुकूल्य नहीं प्राप्त हो सकता। अन्यत्र द्वारपाल स्वामी की आज्ञा से आगन्तुकको भवन में प्रविष्ट करता है, पर यहाँ तो स्वामी एवं सेवक की इतनी एकता है कि आञ्जनेय की आज्ञा ही सर्वोपरि हो जाती है। सुग्रीव एवं विभीषण की शरणागति में प्रभु से बिना पूछे ही इन्होंने दोनों को प्रवेशपत्र दे दिया, कारण कि वे अपने प्रभु से इतने एकरूप हो चुके हैं कि इनके विरुद्ध कभी कोई चेष्टा करते ही नहीं और श्रीरामजी भी आञ्जनेय का अदब मानते हैं। यथा सेवक सेवकाई जानि जानकीश मानै कानि (ह.बा. १२)।

पैसारे शब्द पदसार शब्द का तद्भव है। पादेन सरणं पदसारः प्रवेश इत्यर्थः। यह शब्द प्रवेश के अर्थ में श्रीमानसजी में भी प्रयुक्त हुआ है। यथा अति लघुरूप धरौं निशि नगर करौं पइसार (रा.च.मा. ५-३)। भगवान् के अन्य द्वारपाल श्रीआञ्जनेय के समान नहीं देखे जाते। कहीं-कहीं तो स्वामी को सूचित किए बिना ही प्रतिहार अपनी उच्छृङ्खलता के कारण आगन्तुक को बहुत क्षुब्ध किया करते हैं। इस विषय की स्पष्टता के लिए भागवत के तृतीय स्कन्ध का जय-विजय-उपाख्यान द्रष्टव्य है। सनकादिक एक बार भगवान् मधुसूदन के दर्शनार्थ श्रीवैकुण्ठ धाम पधारे। छह द्वारों को सहजतया लाँघकर वे सप्तम द्वार को भी लाँघने की चेष्ट कर रहे थे कि उनका यह स्वतन्त्रतापूर्वक व्यवहार भगवान् के प्रिय द्वारपाल जय-विजय को नहीं भाया। सन्तों का व्यक्तित्व चमत्कार शून्य तथा नमस्कार प्रधान हुआ करता है। उनकी रहनी में संसार का दिखावा तथा आडम्बर नहीं होता। सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार को यह आशा भी न थी कि उन जैसे विधि-निषेध से बहिर्भूत परम अन्तरङ्गतम भगवत्प्रेमी महात्माओं के साथ भी द्वारपाल से आदेश रूप निरर्थक सांसारिक औपचारिकता की अपेक्षा की जायेगी। जय-विजय ने उन पञ्चवर्षीय दिगम्बर मुनिकुमारों को बिना अनुमति के ही भगवन्मन्दिर में प्रवेश करते देख ईषत् क्रोधवशीभूत होकर परिहासपूर्वक अपने बेंतका प्रहारकर नीचे गिरा दिया। जय-विजय का यह स्वभाव भगवान् तथा भगवान् के भक्त दोनों के लिए प्रतिकूलथा। भागवतकार ने वेत्रेण चास्खलयताम् का प्रयोग किया है। स्खलन का अर्थ होता है गिरना। यथा –

तान् वीक्ष्य वातरशनांश्चतुरः कुमारान् वृद्धान्दशार्धवयसो विदितात्मतत्त्वान्।
वेत्रेण चास्खलयतामतदर्हणांस्तौ तेजो विहस्य भगवत्प्रतिकूलशीलौ॥

– भा.पु. ३-१५-३०

इस उद्दण्डता की पराकाष्ठा से वीतराग महर्षियों का भी हृदयसागर क्रोध की लहर से कुछ क्षुब्ध सा हो गया। तथा वे बोल पड़े कि तुम सर्वान्तर्यामी परम कृपालु प्रभु भगवान् विष्णु के पार्षद होने के योग्य नहीं हो। आज भी तुम्हारा हृदय महत्त्वाकांक्षा की आग से जल रहा है। अतः इस अपराध का उचित दंड ही तुम्हारे लिए उपयुक्त है। तुम काम, क्रोध, लोभ इन तीनों से पीड़ित हो। इसलिए तीन पापिष्ठ लोकों में जाओ। अर्थात् प्रथम जन्म में क्रोध-प्रधान दैत्य बनो (हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष) द्वितीय जन्म में काम-प्रधान राक्षस बनो (रावण और कुम्भकर्ण) एवं तृतीय जन्म में लोभ-प्रधान दानवरूप मानवताहीन मानव (शिशुपाल एवं दन्तवक्र) बनो। यहाँ तीन जन्म पर्यन्त पापिष्ठ लोकों में जाने का भी साभिप्राय था। सनकादि महर्षियों ने जय-विजय को तीन जन्म के लिए इस कारण शाप दिया कि जब जय-विजय ने उन्हें ३-३ बेंत लगाये थे। यही त्रय इमे शब्द के प्रयोग का कारण प्रतीत होता है यथा –

तद्वाममुष्य परमस्य विकुण्ठभर्तुः कर्तुं प्रकृष्टिमिह धीमहि मन्दधीभ्याम्।
लोकानितो व्रजतमन्तरभावदृष्ट्या पापीयसस्त्रय इमे रिपवोऽस्य यत्र॥

– भा.पु. ३-१५-३४

गोस्वामीजी भी इस प्रसङ्ग की चर्चा मानसजी में बड़े ही रोचक ढंग से करते हैं –

द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। जय अरु विजय जान सब कोऊ॥
बिप्र शाप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई॥

– रा.च.मा. १-१२२-४,५

मुक्त न भये हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रमाना॥

– रा.च.मा. १-१२३-१

अर्थात् अन्य द्वारपाल अप्रत्याशित रूप में स्वामी के यहाँ जानेवालों को बेंत के प्रहार से निरस्त करते हैं, किन्तु श्रीहनुमान जी महाराज रावण के द्वारा कृतचरण-प्रहार से पीड़ित विभीषण को भी भगवान् के श्रीचरणारविन्दका शरणागत बना देते हैं। श्रीराघव की शरण में समागत विभीषण के प्रति जब सुग्रीव नाना प्रकार के आक्षेप प्रत्याक्षेप करने लगे, जब आञ्जनेय को बहुत दुःख हुआ, पर श्रीराघव ने मम पन शरणागतभय हारी (रा.च.मा. ५-४३-८) कहकर विभीषण को स्वीकारने का निश्चय किया। तब हनुमान जी अत्यन्त प्रसन्न हुए –

सुनि प्रभु वचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना॥

– रा.च.मा. ५-४३-९

इस प्रकार अन्य द्वारपाल की अपेक्षा आगन्तुक को प्रभु के चरणों में जोड़ने की श्रीहनुमान जी में विलक्षण क्षमता है।