Chaupai 20


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥ २० ॥

शब्दार्थ – दुर्गम – कठिन। सुलभ – सरल। अनुग्रह – कृपा।

अर्थ – हे महाबीर जी। संसार के जितने भी कठिन से भी कठिन कार्य हैं वे सब आपकी कृपा से सरल हो जाते हैं।

व्याख्या – क्योंकि आप सुग्रीव तथा विभीषण के लिए तारण एवं स्वयं तरण हैं तथा जटिल से जटिल कार्य आपने किया है। यथा –

मन को अगम तन सुगम किये कपीस काज महाराज के समाज साज साजे हैं।
देव बंदीछोर रनरोर केसरी किसोर जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं।
बीर बरजोर घटि जोर तुलसी की ओर सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं।
बिगरी सँवारि अँजनीकुमार कीजे मोहि जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं॥

– ह.बा. १५

यहाँ आञ्जनेय के चरित्र वर्णन का उपसंहार करके अब कृपा की आवश्यकता का उपपादन करते हैं।