Chaupai 19


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥ १९ ॥

शब्दार्थ – मेलि – डालकर। जलधि – समुद्र।

अर्थ – प्रभु आप श्रीरामजी की दी हुई रामनामांकित मुद्रिका को मुख में लेकर शत योजन विस्तीर्ण समुद्र को लाँघ गए, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।

व्याख्या – दो शरणागतियों में प्रधान भूमिका का निर्देश कर हनुमान जी में तारणत्व गुण का वर्णन किया। अब तरणत्वका वर्णन कर रहे हैं। अर्थात् हनुमान जी सुग्रीव एवं विभीषण को सागर से तारकर स्वयं भी तर जाते हैं। सुग्रीव के लिए नाम-सेतु तथा विभीषण के लिए कृपा-सेतु की व्यवस्था करते हैं, एवं स्वयं प्रभु मुद्रिका को मुख में लेकर राम-नामामृत चूसते हुए कौतुक में समुद्र को पार करते हैं। यथा –

कौतुक सिंधु नाघि तव लंका। आयउ कपि केहरी अशंका॥

– रा.च.मा. ६-३६-४