Chaupai 18


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥ १८ ॥

शब्दार्थ – जुग सहस्र जोजन – जुग अर्थात् अनेक हजार योजन। भानू – सूर्य।

अर्थ – हे केशरीकुमार। धरातल से हजारों योजन किंवा अनेकों हजार योजन दूर ऊपर वर्तमान सूर्यनारायण को आपने अपने जन्म के एक दिन बाद मधुर फल की भ्रान्ति से निगल लिया था।

व्याख्या – युग शब्द का युगल पर्याय होने से दो-दो एवं एकसे अनेक अर्थ भी होता है। वस्तुतः संस्कृत में शत से ऊपर की संख्यायें अनन्त वाचिका होती हैं। यथा शताधिकाः समाः सङ्ख्या गेयाश्चानन्त्यवाचिकाः। इस दृष्टिसे युग सहस्र का अर्थ होगा अगणित योजन। यह घटना सम्भवतः कार्तिक कृष्ण अमावस्या की है। अमावस्या को ही अपनी सन्धि में राहु सूर्य-ग्रहण की परिस्थिति प्रस्तुत करता है। श्रीहनुमानजी का प्राकट्य कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी मंगलवार को प्रभात वेला में मेष लग्न तथा स्वाति नक्षत्र में श्रीअञ्जना के गर्भ से हुआ था। यथा –

ऊर्जे कृष्णचतुर्दश्यां भौमे स्वात्यां सदाशिवः।
मेषलग्नेऽञ्जनागर्भात्प्रादुर्भूतो महेश्वरः॥

वाल्मीकिके अनुसार सूर्यनारायण पर आञ्जनेयजी के आक्रमण ही चर्चा है तथा इन्द्र के द्वारा इनके वाम हनु (ठोड़ी)पर वज्र का प्रहार हुआ, पर उसमें कोई विकृति नहीं आई। इसलिए प्राशस्त्य अर्थ में मतुप् प्रत्यय करके परम पराक्रमी इन्द्र ने इनका नाम हनुमान् रखा। कुछ लोग वामो हनुरभज्यत (वा.रा. ४-६५-२२) का अर्थ करते हैं कि वामो हनुर्भग्नोऽभवत् अर्थात् हनुमानजी का वाम हनु किञ्चित् भङ्ग हो गया। यह अर्थ उन्होंने भञ्जो धातु (भञ्जो आमर्दने धा.पा. १४५३) निष्पन्न अभज्यत शब्दके आधार पर किया है पर अभज्यत रूप भज धातु (भज सेवायाम् धा.पा. ९९८) कर्मवाच्य लङ्लकार के प्रथमपुरुष के एकवचन में भी निष्पन्न होता है। अभज्यत असेव्यत सेवितोऽभवत् अर्थात् इन्द्र के वज्र से हनुमानजी का वाम हनु सेवित हुआ, टूटा नहीं, इसलिए इन वानर का आजसे हनुमान् नाम विख्यात होगा। क्योंकि यदि श्रीहनुमान् का हनु टूट गया होता तब हनुमान् शब्द में मतुप् प्रत्यय कैसे निष्पन्न होता। क्योंकि मतुप् प्रत्यय सत्ता और प्रशंसा अर्थ में होता है –

भूमनिन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशायने।
सम्बन्धेऽस्तिविवक्षायां भवन्ति मतुबादयः॥

– भा.पा.सू. ५-२-९४

भाष्यकार के अनुसार निन्दा अर्थ में इनि प्रत्यय होता है, तथा प्रशंसा अर्थ में मतुप् ही होता है। जैसे किसी निर्धन को धनवान् नहीं कहा जा सकता उसी प्रकार टूटे हुए हनु वाले व्यक्ति को हनुमान् कैसे कहा जायेगा। इसीलिए इन्द्र कहते हैं –

मत्करोत्सृष्टवज्रेण हनुरस्य यथाऽहतः।
नाम्ना वै कपिशार्दूलो भविता हनुमानिति॥

– वा.रा. ७-३६-११

अर्थात् मेरे द्वारा फेंके गये वज्र से इनका हनु अहतः अर्थात् नहीं टूटा इसलिए इन वानर श्रेष्ठ का आज से हनुमान् नाम प्रचलित होगा। विनय-पत्रिका में भी गोस्वामीजी इसी सिद्धान्तकी पुष्टि करते हैं। यथा जाकी चिबुक चोट चूरन किए रद मद कुलिश कठोर को (वि.प. ३१-४)।

इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकीय रामायण के अनुसार हनुमान जी ने सूर्य को निगला नहीं, पर हनुमान-चालीसा में लील्यो ताहि मधुर फल जानू कह रहे हैं। इस पक्षकी पुष्टि गोस्वामी जी विनयपत्रिका में करते हैं चंडकरमंडलग्रासकर्त्ता (वि.प. २५-२)। इस विरोध का समाधान कल्पभेद से हो जाता है। वाल्मीकि कथा में हनुमान जी ने सूर्यनारायण को नहीं ग्रसा था, विनयपत्रिका तथा हनुमानचालीसा के घटना कल्प में ग्रस लिया था। देवताओं की विनती पर छोड़ा। सूर्यनारायण को ग्रसना असम्भव नहीं है क्योंकि कार्य कारण में विलीन होते हैं। अतः तेजस्तत्त्वसूर्य वायुतत्त्वरूप हनुमान में विलीन हों यह अत्यन्त उचित है।