Chaupai 17


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

तुम्हरो मन्त्र बिभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना॥ १७ ॥

शब्दार्थ – मन्त्र – भगवत्प्रपत्तिसिद्धान्त।

अर्थ – हे आञ्जनेय। विभीषण ने आपके रामप्रेमरूप मूलमन्त्र को स्वीकारा। उसके परिणाम स्वरूप वे लङ्का के कल्पान्त शासक स्वामी बन गये। यह सारा संसार जानता है।

व्याख्या – विभीषण ने लङ्का में अपर रात्रिकाल के प्रथम साक्षात्कार के अनन्तर निराशा भरे स्वर में आञ्जनेय से कहा –

तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहैं कृपा भानुकुल नाथा॥

– रा.च.मा. ५-७-२

अर्थात् भानुकुलनाथ ने भानुपुत्र पर कृपा की क्योंकि वह उनके कुलप्रवर्तक का पुत्र है, पर मुझमें कोई पात्रता नहीं है। श्रीआञ्जनेय ने कहा “विभीषण। भगवत्स्मरण ही उनकी कृपा का एकमात्र असाधारण साधन है।” यथा –

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहि दुखारी॥

– रा.च.मा. ५-८-१

इसी मन्त्र ने विभीषण को लङ्केश्वर बना दिया। हनुमान जी ने सुग्रीव तथा विभीषण इन दो महानुभावों को भगवान् से जोड़ा। एक के यहाँ प्रभु को ले गये और एक को प्रभु के पास ले आये। सुग्रीव को प्रभु का प्रभाव सुनाकर एवं विभीषण को प्रभु का स्वभाव समझाकर। उसी प्रकार हम विषयी साधकों को भी प्रभु कृपा का अनुभव करायें।