Chaupai 16


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥ १६ ॥

शब्दार्थ – उपकार – भलाई।

अर्थ – आपने सुग्रीव का महान् उपकार किया तथा उन्हें श्रीरामजीका दर्शन कराकर किष्किन्धा का साम्राज्य दे दिया।

व्याख्या – भाव यह है कि आपके बिना सुग्रीव कुछ भी नहीं कर पाते। पहले उन्हें श्रीराम जी को देखकर भय हुआ, पर उन्होंने जब आपकी पीठ पर बैठे हुए श्रीरामजी को देखा तभी सम्यक् दर्शन हुआ। क्योंकि परमात्मा का सम्यक् दर्शन संत-दृष्टि के बिना सम्भव नहीं है। यथा –

तँह रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा॥
अति सभीत कह सुनु हनुमाना। पुरुष जुगल बल रूप निधाना॥

– रा.च.मा. ४-१-२,३

पश्चात् सम्यक् दर्शन –

जब सुग्रीव राम कहँ देखा। अतिशय जन्म धन्य करि लेखा॥

– रा.च.मा. ४-४-६

राम मिलाय – श्रीराम जी से मिलने की सुग्रीव में कोई योग्यता नहीं थी, पर आपने अपनी विशेष कृपा के आधार पर श्रीराम जी को सुग्रीव के पास ले जाकर उन्हें कृतकृत्य किया। अतः आञ्जनेय को सुग्रीवदुर्विधिबन्धु कहा गया है।

राजपद दीन्हा – भाव यह है कि आपने सुग्रीव को राजपद एवं रामपद देकर मुक्ति तथा भुक्ति दोनों का अधिकारी बना दिया है। वैसी ही कृपा हम असमर्थ जीवों पर करें।