Chaupai 15


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सकैं कहाँ ते॥ १५ ॥

शब्दार्थकोर्वेदस्य विदो वेत्ता कोविदः परिकीर्तितः को अर्थात् वेद, विद अर्थात् जानने वाला। इस प्रकार कोविद – वेदज्ञ।

अर्थ – यम कुबेर आदि यावन्मात्र दिक्पाल हैं वे भी तुम्हारा यह यश गाते रहेंगे। इस अनन्त यश को सामान्य कवि एवं वेदज्ञ विद्वान कहाँ से कह सकते हैं।

व्याख्या – यहाँ जहाँ ते शब्द के साथ पूर्व क्रिया गावैं का अन्वय होगा। श्रीहनुमानचालीसा की प्रथम चौपाई से लेकर दसवीं चौपाई तक गोस्वामीजी ने श्रीरामजी के वात्सल्य भाजन श्रीआञ्जनेय के मङ्गलमय स्वरूप तथा गुणका वर्णन किया। अनन्तर ग्यारहवीं चौपाई से बीसवीं चौपाई तक श्रीहनुमानजी के श्रीराघवयश भूमिकारूप चारु चरित्र का वर्णन कर रहे हैं। जिसमें ग्यारहवीं चौपाई से पन्द्रहवीं चौपाई तक लक्ष्मणमूर्च्छा प्रसंग में प्रस्तुत की हुई हनुमान जी की महत्तम भूमिका का वर्णन है। मानो यही पाँच चौपाइयाँ महामंत्र के तात्पर्य के रूप में कही गयी हैं। लक्ष्मणमूर्च्छा-प्रसंग का दार्शनिक तात्पर्य बड़ा मनोरंजक तथा साभिप्राय है। जैसे मेघनाद की शक्ति से मूर्च्छित श्रीलक्ष्मण को आञ्जनेय जी ने द्रोणाचल से संजीवनी लाकर जीवन-दान दिया, उसी प्रकार आसक्ति रूप वीरघातिनी से मूर्च्छित हुए जीवों को वैराग्यवान् संत रामनामरूप हनुमानजी सद्गुरु सुषेण वैद्य की अनुमति से वेदपुराणरूप द्रोणाचल में वर्तमान, रामभक्तिरूप सञ्जीवनी ले आकर श्रीराम-तत्त्वरूप जीवनदान देते रहें, इसी उद्देश्य से श्रीहनुमान-चालीसा में यह प्रसंग निबद्ध किया गया। दिक्पाल ८ हैं – इन्द्र, ईशान, कुबेर, अग्नि, वरुण, वायु, यम, नैर्ऋत्य।