Chaupai 14


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा। नारद सारद सहित अहीशा॥ १४ ॥

शब्दार्थ – सनकादिक – सनक, सनातन, सनन्दन, सनत्कुमार (ये चार ब्रह्मा जी के प्रथम ऊर्ध्वरेता पुत्र हैं)।

अर्थ – श्रीराघव प्रशंसा के शब्दों में कह रहे हैं कि हे वत्स। तुम्हारे इस परम पावन यशको न केवल शेष अपितु सनकादिक ऊर्ध्वरेता ऋषि, ब्रह्मादि देवगण, मुनियों में श्रेष्ठ भगवान् नारद, सरस्वती के सहित अहीश्वर (विष्णु व शङ्कर) भी गाते रहेंगे।

व्याख्या – इस चौपाई में भी पूर्व क्रिया गावैं का अन्वय होगा। भाव यह है कि तुम्हारा लक्ष्मण जीवनदानरूप परम पावन यश त्रिलोकविदित हो जायेगा। अतः पाताल में शेष, मर्त्यलोक में सनकादि एवं नारद, तथा स्वर्गलोक में ब्रह्मादि, शारदा एवं विष्णु तथा शङ्कर भी गाएंगे। पूर्व में शेष के लिए सहसबदन शब्द का प्रयोग हो चुका है। अतः यहाँ अहीशा पद अहितल्पवासी विष्णु यद्वा अहिकौपीनधारी श्रीशिव का बोधक है। यथा विष्णु जौ अहि सेज शयन हरि करहीं (रा.च.मा. १-६९-५)। शिव जटा मुकुट अहि मौर सँवारा (रा.च.मा. १-९२-१), कुंडल कंकन पहिरे व्याला (रा.च.मा. १-९२-२), भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी (रा.च.मा. १-१०६-८) आदि।