Chaupai 12


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहिं सम भाई॥ १२ ॥

शब्दार्थ – रघुपति – रघुवंश के स्वामी अथवा रघु अर्थात् जीव मात्र के स्वामी श्रीराम। लङ्घन्ति पापपुण्यानि ये ते रघवो जीवास्तेषां पती रघुपतिः

अर्थ – रघुकुल के स्वामी तथा समस्त प्राणिमात्र के ईश्वर श्रीरामचन्द्र जी ने आपकी बड़ी प्रशंसा की और कहा कि तुम मुझे भाई भरत के समान प्रिय हो।

व्याख्याभाई शब्द का अन्वय भरतहि के साथ ही उचित होगा अर्थात् भाई भरत के समान तुम मुझे प्रिय हो। हनुमान जी के साथ भाई शब्द का अन्वय करने से यथा सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाही (रा.च.मा. ५-३२-७) इस अर्धाली की एकवाक्यता नहीं संगत होगी क्योंकि यहाँ श्रीराघव ने आञ्जनेयको पुत्र कहा। ध्यान रहे कि श्रीलक्ष्मण से श्रीहनुमान जी का इतना वैशिष्ट्य अवश्य है कि श्रीरघुनाथ जी श्रीलक्ष्मणजी को भाई तथा पुत्र दोनों मानते हैं। भाई यथा अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई (रा.च.मा. २-७१-१)। पुत्र यथा अब अपलोक शोक सुत तोरा (रा.च.मा. ६-६१-३१)। पर हनुमानजी को केवल पुत्र रूप में ही स्वीकारते हैं यथा सिय सुखदायक दुलारो रघुनायक को (ह.बा. १०)।