Chaupai 10


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचन्द्र के काज सँवारे॥ १० ॥

शब्दार्थ – भीम – बीभत्स तथा धीरों को भी त्रास देने वाला।

अर्थ – आपने महाकाल को भी भयभीत करने वाले भीम रूपको धारणकर रावणपक्षीय असुरों का संहार किया एवं भगवान् श्रीरामचन्द्र जी के समस्त कार्यों को सँवारा।

व्याख्या – इनकी भीमता देखकर महाभारत काल के धुरन्धर वीर भीम ने भी अपनी आँखें बन्द कर ली थीं। एक बार द्रौपदी की रुचिरञ्जन के लिए स्वर्ण किञ्जल्कयुक्त कमल लेने भीमसेन श्रीहनुमान जी के निवासस्थान गन्धमादन के निकट कदलीवन पधारे। भीम को उद्धत देखकर हनुमान वृद्ध बन्दर का रूप धारण कर मार्ग में लेट गये। भीम ने मार्ग छोड़ने का अनुरोध किया। श्रीआञ्जनेयने सहजता से कहा कि “मैं वृद्ध हूँ, अतः मेरी पूँछ उठाकर मुझे इस स्थान से हटा दो।” भीम की सभी चेष्टायें असफल हुईं पर हनुमान जी की पूँछ टस से मस न हुई। अनन्तर अपने को श्रीहत देखकर उस वृद्ध वानर वानरेन्द्र को उन्होंने पहचान लिया और मारुति को प्रणामकर उनके मौलिक रूप को देखने की इच्छा प्रकट करी। श्रीहनुमान जी ने अपना स्वर्णशैल संकाश शरीर प्रस्तुत किया। उनके कथा-श्रवण में व्यतिक्रम जानकर शीघ्र जाने के लिए आदिष्ट करते हुए बोले –

ततस्त्वप्सरसस्तात गन्धर्वाश्च तथानघ।
तस्य वीरस्य चरितं गायन्ती रमयन्ति माम्॥

– म.भा. ३-१४७-३९

हे भीम। स्वर्ग की श्रेष्ठ अप्सरायें एवं तुम्बुरु आदि कुशलगायक गन्धर्व भगवान् श्रीराघव के चारु चरित को गाते हुए मुझे परमानन्द-सुधा-सागर में मग्न किए रहते हैं। यह कथा महाभारत वनपर्व में स्पष्ट है। इसी का उद्धरण गोस्वामीजी ने कवितावली में प्रस्तुत किया है कौन के तेज बलसीम भट भीम से भीमता निरखि कर नयन ढाँके (क. ६-४५)। असुर-संहारका क्या कहना। आञ्जनेय के संग्राम की प्रशंसा श्रीरामचन्द्र स्वयं करते हैं –

हाथिन सों हाथी मारे घोरेसों सँघारे घोरे रथन सों रथ बिदरनि बलवान की।
चंचल चपेट चोट चरन चकोट चाहे हहरानि फौजें भहरानी जातुघान की।
बार बार सेवक सराहना करत राम तुलसी सराहे रीति साहिब सुजान की।
लम्बी लूम लपटि झपटि पटकत भट देखो देखो लखन लरनि हनुमान की॥

– क. ६-६२

श्रीराम जी के समस्त कार्यों को हनुमान जी ने सजा दिया। भाव यह है कि रावणादिका वध राघव की इच्छा से हो सकता था पर विभीषणादिका उद्धार आञ्जनेय के बिना कथमपि संभव नहीं था। कारण कि जब तक जीव रघुनाथ जी के सम्मुख नहीं होता तब तक उसके पाप नष्ट नहीं होते। यथा –

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

– रा.च.मा. ५-४४-२

श्रीरघुनाथ जी समस्त प्राणिमात्र के सम्मुख होकर भी जीव की सम्मुखता के बिना उसका कल्याण नहीं कर सकते। यथा सन्मुख सबकी ओर । अतः गोस्वामीजी यह अनुरोध करते हैं कि अनादि काल से भगवत्पाद-पद्म-विमुख इस जड़ जीव को श्रीमन्मारुति के बिना कौन श्रीराम-सन्मुख कर सकता है। यथा –

आते आञ्जनेय न जो व्याकुल धरा पै आज क्षुधित जनों को भक्ति अमिय पिलाता कौन।
कौन दर्शाता रामधाम का पवित्र पंथ राम नाम मंजु मणिदीपक जलाता कौन।
कौन सरसाता उर भाव सरसीरुह को राम प्रेम मधुर सुमोदक खिलाता कौन।
रामगुण गायक बनाता कौन गिरिधर को मुझसे पतित को पथ सुमति दिलाता कौन॥
आते आञ्जनेय जो न अमल अवनि पै आज वैष्णवों की विजय वैजयन्ती फहराता कौन।
कौन लाँघ जाता शतयोजन पयोनिधि को मैथिली का विरह दवानल बुझाता कौन।
कौन लिपटाता रघुबीर पद पंकज में राजीवनयन के नयन नीर से नहाता कौन।
साधन विहीन दृगहीन मूढ़ गिरिधर को मानस मंदाकिनी में मज्जन कराता कौन॥

इस प्रकार स्पष्ट है कि आञ्जनेयका चरित्र श्रीराघवजी की लीला का शृंगार है और यही सँवारे पदका स्वारस्य है। यथा काज महाराज के समाज सब साजे हैं (ह.बा. १५), सकल समाज साज साजे रघुबर के (ह.बा. ३३)।