Chaupai 09


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥ ९ ॥

शब्दार्थ – बिकट – भयंकर।

अर्थ – हे मारुतेय। आपने अत्यन्त लघु बन्दर का रूप धारण करके माता सीता के दर्शन किए और अत्यन्त विशाल एवं भयावह रूप धारण करके रावण की नगरी लङ्का को जला दिया।

व्याख्या – अशोक वाटिका में हनुमान जी का इतना लघुतम रूप हुआ कि उन्होंने अपने को वृक्ष के पल्लवों में छिपा रक्खा –

तरु पल्लव महँ रहा लुकाई। करइ विचार करौं का भाई॥

– रा.च.मा. ५-९-१

अध्यात्म रामायण में इन्हें कलविङ्कसमाकारः कहा गया है अर्थात् छोटी गौरैया के समान उनका आकार था। यहाँ यह शङ्का करना निरर्थक है कि मुद्रिका कहाँ रही होगी। मुद्रिका भगवान् के श्रीविग्रह का आभूषण होने से चिन्मय है। अतः परिस्थिति के अनुसार लघुता एवं गौरव उसके लिए सहज है। गीतावली जी में सीता-मुद्रिका संवाद भी वर्णित है। मुद्रिका स्पष्ट कहती है कि नींद भूख न देवरहि परिहरे को पछिताउ (गी. ५-४-२)। जो श्रीसीताजी को श्रीराघव के समाचार सुना सकती है उसकी लघुता एवं गुरुता के विषय में सन्देह को स्थान ही कहाँ। हनुमानजी के लघु रूप को देखकर श्रीसीताजी को लीलापक्ष में संदेह हो गया। पुनः उन्होंने भीम रूप की झाँकी से मैथिली के संदेह को दूर किया। यथा –

मोरे हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रकट कीन्ह निज देहा॥
कनक भूधराकार शरीरा। समर भयंकर अति बलबीरा॥
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघुरूप पवन सुत लयऊ॥

– रा.च.मा. ५-१६-७,८,९

लंकादहन में तो इनका विकट रूप प्रसिद्ध ही है, विशेष कवितावली सुन्दरकाण्ड द्रष्टव्य है। इसी अवसर पर रावण को अपना रुद्ररूप प्रदर्शित करने हेतु हनुमान जी ने अपना पञ्चमुखी रूप प्रदर्शित किया।