Chaupai 08


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥ ८ ॥

शब्दार्थ – रसिया – रसिक। बसिया – निवास करने वाले।

अर्थ – हे मारुते। आप श्रीराघवजू के चरितामृत को सुनने के अद्वितीय रसिक हैं एवं आपके मन मन्दिर में श्रीराम, श्रीलक्ष्मण एवं श्रीसीता का निवास है यद्वा आपही वात्सल्यातिशय होने से श्रीराम, लक्ष्मण एवं श्रीसीताजी के मन में निवास करते हैं।

व्याख्या – प्रभु-चरित्र श्रवण के श्रीहनुमान जी इतने रसिक हैं कि कथा के लोभ में इन्होंने प्रभुका सान्निध्य ठुकरा दिया। राज्याभिषेक के पश्चात् राजाधिराज श्रीराम ने सम्पूर्ण वानर-भालुओं को विविध दान एवं प्रीतिदान देकर विसर्जित किया एवं श्रीआञ्जनेयसे अपने परम धाम में रहने के लिए मूक इच्छा व्यक्त की। तब श्रीमारुति ने मूक भाषा में अन्तर प्रश्न किया कि आप अपने परम धाम में मेरे रामायण कथा-श्रवण की व्यवस्था करेंगे। श्रीरामभद्रजू को निरुत्तर देखकर हनुमानजी महाराज ने पुनः कहा –

यावद्रामकथा वीर चरिष्यति महीतले। तावच्छरीरे वत्स्यन्तु प्राणा मम न संशयः॥

– वा.रा. ७-४०-१७

अतः हे वीर जब तक आपकी श्रीरामायण-कथा इस भूमण्डलपर चलती रहेगी, तब तक आपकी आज्ञा से मेरे शरीर पर प्राण विद्यमान रहेगें। श्रीराम ने भी इस वरदान को स्वीकारते हुए कहा –

चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका। तावत्ते भविता कीर्तिः शरीरेऽप्यसवस्तथा॥

– वा.रा. ७-४०-२०

अर्थात् जब तक इस लोक में मेरी कथा चलेगी तब तक तुम्हारी कीर्ति अचल रहेगी एवं तुम्हारे शरीर में प्राण तब तक वर्तमान रहेंगे। राम-कथा के लोभ में कालनेमिका षड्यन्त्र भी उन्हें क्षणमात्र तक स्वीकार्य-सा हो गया। स्वयं श्रीराम-कथा श्रवणमात्र से हनुमान जी के नेत्र-कमल सजल हो जाते हैं और वाणी शिथिल हो जाती है। यथा जयति रामायण श्रवण संजात रोमाञ्च लोचन सजल शिथिल वाणी (वि.प. २९-५)। श्रीराम-कथा के निमित्त ही जिन्होंने साकेत के सुख को ठुकराकर धराधाम पर विचरण करते हुए राम-कथा श्रवणार्थ अपना जीवन रक्खा ऐसे श्रीआञ्जनेय के समान श्रीराम-कथा का और कौन रसिक हो सकता है। श्रीहनुमान जी की श्रीराम-कथा विषय का वर्णन करते हुए अतिमानसस्तोत्र में श्रीवत्साङ्कमिश्र कहते हैं –

ईदृग्गुणो ननु बभूविथ राघवत्वे यस्तावकं सुचरितं सकृदन्वभुङ्क्त। सोऽत्रैव हन्त हनुमान् परमां विमुक्तिं बुद्ध्याऽवधूय चरितं तव सेवतेऽसौ॥

– अ.मा.स्तो. ३२

अर्थात् रामावतार में श्रीराघवेन्द्र ने ऐसे दिव्य गुण गणों का आविर्भाव किया जिनके श्रवण-लोभवश श्रीआञ्जनेयने हस्तगत मुक्ति को भी ठुकरा दिया।