Chaupai 07


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

विद्यावान गुणी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥ ७ ॥

शब्दार्थ – आतुर – उत्सुक।

अर्थ – हे आञ्जनेय आप समस्त विद्याओं के प्रशस्त भण्डार हैं एवं समस्त गुण आप में निवास करते हैं एवं आप अत्यन्त चतुर हैं तथा श्रीरामचन्द्रजी के कार्य को करने के लिए उत्सुक रहा करते हैं।

व्याख्याबिद्या शब्द यहां अष्टादश विद्याओं को संकेत करता है। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि श्रीहनुमान जी ने श्रीमानस के धरातल पर तीन बार ब्राह्मण वेष बनाया। प्रथम बार श्रीराम-लक्ष्मण के समक्ष। श्रीराम विद्यानिधि हैं। यथा बिद्या बिनय निपुन गुन शीला (रा.च.मा. १-२०४-६), बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही (रा.च.मा. १-२०९-७)। अतः विद्यानिधि के समक्ष हनुमान जी ने ब्रह्म विषयक प्रश्न करके अपनी विद्या प्रखरता का परिचय दिया। द्वितीय बार विभीषण के समक्ष लंका में। यहाँ विभीषण के आकुलत्व रूप गुण को देखकर उन्हें राम परत्व का उपदेश कर अपनी गुणज्ञता का परिचय दिया। क्योंकि

सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता॥
धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जाकर मन राता॥

– रा.च.मा. ७- १२७-१,२

आञ्जनेय विभीषण से कह पड़ते हैं –

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे विलोचन नीर॥

– रा.च.मा. ५-७

तृतीय बार नन्दिग्राम में भरत जी के समक्ष। यहाँ आञ्जनेय का लोकोत्तर चातुर्य दृष्टिगोचर होता है। श्रीभरतभद्र अविराम अश्रुधारा से श्रीरामभद्र के भावनामय पादपद्म का अभिषेक कर रहे हैं। राम राम रघुपति जपत स्रवत नयन जल जात (रा.च.मा. ७-१ख)। अतः श्रीहनुमान जी सामने नहीं आते। क्योंकि अश्रुपात काल में ठीक-ठीक न दीख पड़ने से पूर्व की भाँति फिर कोई अन्यथा अनुमान न हो जाय इसलिए बोलेउ स्रवन सुधासम बानी (रा.च.मा. ७-२-२) उनके कान में जाकर बोले। तीन चौपाइयों में श्रीराघव के आगमन का समाचार सुनाकर श्रीभरत को उन्होंने विरह, भय तथा विषाद से मुक्त किया। और भरतभद्र ने नाहिन तात उरिन मैं तोही (रा.च.मा. ७-२-१४) कहकर कृतज्ञता ज्ञापन किया। ग्रन्थ गौरव के भय से सूत्ररूप में दिग्दर्शन कराया गया। विज्ञ पाठक तीनों प्रसंगों की स्वयं संगति लगा लेंगे।

श्रीराम-काज करने के लिए वे इतने आतुर हैं कि क्षण-भर भी विश्राम उचित नहीं मानते और नागपाश में बँधकर भी लज्जा का अनुभव नहीं करते। यथा

(१) राम काज कीन्हे बिनु मोहि कहाँ विश्राम (रा.च.मा. ५-१)।

(२) मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥ (रा.च.मा. ५-२२-६)