Chaupai 06


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

शंकर स्वयं केशरीनन्दन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥ ६ ॥

शब्दार्थ – स्वयं – साक्षात्।

अर्थ – हे प्रभो। आप साक्षात् श्रीशङ्कर भगवान् अर्थात् उनके अभिन्न अंश तथा केशरी के नन्दन (क्षेत्रज) पुत्र हैं। आपका तेज एवं प्रताप महान् है तथा आप सम्पूर्ण जगत के द्वारा वंदित हैं।

व्याख्या – अर्थात् स्वयं शिव ही केशरी नन्दन के रूप में पधारे। यथा रुद्र अवतार संसार पाता (वि.प. २५-३)। शंकर स्वयं केशरी नंदन यह प्रसंग अद्यावधि बहुतसे जिज्ञासुओं की जिज्ञासा एवं अनेक शंकालुओं की शंका का केन्द्र बिन्दु बना रहा है क्योंकि एक ही हनुमान जी महाराज को पवनसुत एवं केशरीनन्दन शब्द से अभिहित किया गया है। एक पुत्र के दो पिता कैसे सम्भव हैं। पर इसका समाधान श्रीराघव की कृपा से अत्यन्त सरल एवं सुबोध है। सौभाग्य का विषय है कि श्रीहनुमान जी के न केवल दो अपितु तीन पिताओं का प्रमाण हनुमान चालीसा में ही प्राप्त हो जाता है

(१) पवनसुत नामा (ह.चा. २)

(२) केशरी नन्दन (ह.चा. ६)

(३) राम दुलारे (ह.चा. ३०)

इसका उत्तर यह है कि श्रीहनुमान जी श्रीपवन के औरस पुत्र हैं। यथा मारुतस्यौरसः पुत्रः (वा.रा. ४-६६-७)। क्योंकि वायुदेव ने ही साक्षात् शिव के तेज को अञ्जना के गर्भ में समाहित किया था क्योंकि उनके बिना इस पवित्र तेज को कोई भी अञ्जना तक पहुँचा नहीं सकता था। चूँकि शिवजी अंशतः आञ्जनेयके रूप में अवतीर्ण हुए अतः स्वयं शब्द अंश के ही अर्थ में व्यवहृत हुआ। चूँकि वे केशरी जी की पत्नी में प्रकट हुए, अतः वह केशरी नामक वानर के क्षेत्रज पुत्र कहलाये। यथा सकैं न बिलोकि बेष केशरीकुमार को (क. ५-१२)। श्रीराम जी ने उन्हें वात्सल्य प्रदान किया। अतः उनके मानस-पुत्र हुए। यथा –

सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं॥

– रा.च.मा. ५-३२-७

इस प्रकार उपासना की दृष्टि से श्रीआञ्जनेय वायु के औरस पुत्र, ज्ञानकी दृष्टि से शिवजी के अभिन्न अंश, कर्मकाण्ड की दृष्टि से कपिकुलतिलक केशरी के क्षेत्रजपुत्र एवं शरणागति की दृष्टि से श्रीराघव के मानस पुत्र हैं।

तेज प्रताप महा जग बंदन – इनका तेज एवं प्रताप महान् है। यथा –

(१) तेज को निधान मानो कोटिक कृसानु भानु (क. ५-४)।

(२) वेग जीत्यो मारुत प्रताप मारतण्ड कोटि (क. ५-९)।

प्रचलित प्रति में शंकर सुवन पाठ मिलता है। इसका अर्थ – शिव के तेज को वायुदेव श्रीअञ्जना के गर्भ में समाहित किए। यह वायु शिवजी की अष्टम मूर्ति कहे जाते हैं। यथा अभिज्ञानशाकुन्तलम् के मङ्गलाचरण में महाकवि कालिदास लिखते हैं यया प्राणिनः प्राणवन्तः (अ.शा. १-१) – अर्थात् जिस वायुमयी शिवजी की मूर्ति से समस्त प्राणियों की प्राण रक्षा होती है। अतः इन्हीं शिवजी की अष्टम मूर्ति भगवान् वायु के औरस पुत्र होने के कारण हनुमान जी शंकर सुवन कहे जाते हैं (वायु-रूप-शंकर के पुत्र)। यद्वा पौराणिक गाथाओं से स्पष्ट है कि अञ्जना की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने उनके यहाँ पुत्ररूप में आने का वरदान दिया अतः अंश में ही यहाँ सुवन शब्द का व्यवहार है।

[१] गुरुदेव द्वारा सम्पादित श्रीहनुमानचालीसा के प्रामाणिक संस्करण में शंकर स्वयं पाठ है – जालस्थल सम्पादक।