Chaupai 05


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ छाजै॥ ५ ॥

शब्दार्थ – छाजै – शोभित हो रहा है।

अर्थ – हे आञ्जनेय। आपके वज्रवत् सुदृढ़ हस्त में श्रीराम की विजय-ध्वजा विराज रही है एवं आपके स्कन्ध पर मूँज का यज्ञोपवीत शोभित हो रहा है।

व्याख्या – यह झाँकी श्रीभरत जी के समक्ष ब्राह्मण वेष में पधारे हुए श्री आञ्जनेय की है। इनके हाथ में श्रीराघवजी की विजय वैजयन्ती फहरा रही है। यथा भानुकुल भानु कीरति पताका (वि.प. २६७)।

काँधे पर मूँज का यज्ञोपवीत आञ्जनेय के अखण्ड ब्रह्मचर्य को सूचित करता है अथवा उनके हाथ में वज्र के समान शत्रुदल-नाशिनी गदा एवं वैष्णवविजयध्वजा विराजमान हैं। इस व्याख्या से व्यञ्जित हनुमान जी का गदाधारण ध्वनित होता है।