Chaupai 04


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

कंचन बरन बिराज सुबेषा। कानन कुंडल कुंचित केशा॥ ४ ॥

शब्दार्थ – कंचन – स्वर्ण। कुंचित – घुँघराले।

अर्थ – हे कपिश्रेष्ठ आपका वर्ण तप्त स्वर्ण के समान तेजपूर्ण है तथा आप अत्यन्त सुन्दरवेष में विराज रहे हैं। आपके श्रवणों में कुण्डल चमक रहे हैं तथा आपके केश घुँघराले हैं।

व्याख्या – श्रीहनुमान जी ने निष्किञ्चना सेवा के लिए अपने को वानर शरीर में परिणत किया जिसमें सुन्दर वेष, श्रवणों में कुण्डल एवं केशों की सजावट सङ्गत नहीं हो पाती। इन्होंने अपने को सब बिधि हीन चंचल कपि भी कहा। यथा –

कहुहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबही बिधि हीना॥

– रा.च.मा. ५-७-७

श्रीगोस्वामी जी ने भी साधुमें वेष प्राधान्यका खण्डन करते हुए जाम्बवान् एवं हनुमानजी को ही कुवेशधारी होने पर साधुओं में शिरमौर एवं सम्मानार्ह माना। यथा –

कियउ कुवेश साधु सनमानू। जिमि जग जामवन्त हनुमानू॥

– रा.च.मा. १-७-७

अतः यहाँ ब्राह्मण वेशधारी हनुमानजी की झाँकी का वर्णन सङ्गत लगता है। श्रीमानसजी में भी श्रीराम विभीषण एवं श्रीभरत जी के समक्ष ब्राह्मण वेष में हनुमान जी का आगमन प्रसिद्ध ही है। गौर शरीर की उपमा काञ्चन वर्ण से ही दी जाती है। तथा ब्राह्मण का गौरवर्ण उसकी कुलीनता का द्योतक होता है गौरो ब्राह्मणः कुलीनः। बहुवेषधारी आञ्जनेयका कुलीन भद्रवेष एवं केशों का कुञ्चित होना उनके रूपानुरूप ही है।

(१) बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ (रा.च.मा. ४-१-६)।

(२) बिप्र रूप धरि बचन सुनाए (रा.च.मा. ५-६-५)।

(३) बिप्र रूप धरि पवन सुत आइ गयउ जनु पोत (रा.च.मा. ७-१क)।

यही ध्यान अगली चौपाई में भी समझना चाहिए।