Chaupai 03


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥ ३ ॥

शब्दार्थ – बिक्रम – विशिष्ट क्रम सम्पन्न या विशेष प्रकार की लंघनक्रिया सम्पन्न (क्रमु पादविक्षेपे धा.पा. ४७३)।

अर्थ – आप महावीर तथा विशेष साधना क्रम से सम्पन्न किंवा विशिष्ट समुद्र के लाँघने की क्रिया से युक्त हैं। आप का शरीर वज्रमय है। आप कुबुद्धि को नष्ट करनेवाले एवं भगवद्भक्ति पूर्ण बुद्धि से युक्त व्यक्ति का साथ देने वाले उचित संगी हैं।

व्याख्या – महावीर केवल बाह्य शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। पर श्रीमारुति बाह्य एवं आन्तरिक (बाहरी तथा भीतरी) उभय प्रकार के शत्रुओं का दमन करते हैं। इसीलिए इनके विषय में एक सूक्ति है –

ऋते भीष्माद्धि गाङ्गेयादृते वीराद्धनूमतः।
हरिणीखुरमात्रेण चर्मणा मोहितं जगत्॥

– मा.सु.सं. १७४९

अर्थात् को जग काम नचाव न जेही (रा.च.मा. ७-७०-७)। समस्त प्राणी काम-किङ्कर होकर उसके समक्ष नाचते हैं, पर आञ्जनेय जी रघुपतिकिङ्कर होकर उन्हीं के श्रीचरणों में नृत्य करते हैं। यथा जयति सिंहासनासीन सीतारमण निरखि निर्भर हरष नृत्यकारी (वि.प. २७-५)। अतः मानस में भी इन्हें महाबीर कहा गया –

महाबीर बिनवऊँ हनुमाना। राम जासु जस आपु बखाना॥

– रा.च.मा. १-१७-१०

बिक्रम – इनका साधना-क्रम विशिष्ट है। इसलिए यह भगवान् श्रीराम को पीठ तथा हृदयपर आसीन करते हैं। यथा लिए दोऊ जन पीठ चढ़ाई (रा.च.मा. ४-४-५), चलेउ हृदय धरि कृपानिधाना (रा.च.मा. ५-२३-१२)। यद्वा इनके समुद्र-लङ्घन की क्रिया भी बहुत विशिष्ट है। स्वयं कहते हैं लीलहि लाँघउ जलधि अपारा (रा.च.मा. ४-३०-८)। मैनाक, सुरसा एवं सिंहिका जैसे विघ्नों के प्रस्तुत होने पर भी इनका वेग विहत नहीं हुआ। यथा –

विषण्णा हरयः सर्वे हनूमन् किमुपेक्षसे।
विक्रमस्व महावेग विष्णुस्त्रीन्विक्रमानिव॥

– वा.रा. ४-६६-३७

हे हनुमान सम्पूर्ण वानर बहुत दुखी हैं, उनकी उपेक्षा क्यों करते हो। जिस प्रकार भगवान् विष्णु ने तीन बार चरण का विक्षेप करके समस्त लोकों को नाप लिया था उसी प्रकार एक बार समुद्र लाँघने के लिए अपने चरण का विक्षेप करो। अतः यहाँ बिक्रम का अर्थ है विशेष प्रकार के चरण विक्षेप की प्रक्रिया जिसकी एक छलाँग से भी कम हो गया भूमण्डल से सुदूर नभो मण्डल का परिमाण। यथा बानर सुभाय बालकेलि भूमि भानु लागि फलँगु फलाँगहूँ ते घटि नभतल भो (ह.बा. ५)।

बजरंगी यह शब्द वज्राङ्गी का तद्भव है। जन्म लेने के एक दिन के ही पश्चात् अर्थात् कार्त्तिक कृष्ण अमावस्या को प्रातःकाल क्षुधा से पीड़ित हनुमान जी महाराज ने लाल फलकी भ्रान्ति से सूर्य नारायण के ऊपर आक्रमण कर दिया। उसी समय राहु सूर्य नारायण को ग्रसने हेतु वहाँ उपस्थित था। हनुमान जी ने सूर्य को छोड़कर राहु पर ही आक्रमण कर दिया। अनन्तर राहु से सूचना पाकर वज्रपाणि इन्द्र ऐरावत पर आरूढ़ हो वहाँ उपस्थित हुए। अब श्वेत फलकी भ्रान्ति से ऐरावत पर आक्रमण करते देखकर इन्द्र ने उनकी बायी ठोड़ी पर वज्रका प्रहार करके उन्हें धराशायी कर दिया। पश्चात् क्रुद्ध होकर पवन ने अपने संचार को समाप्त कर प्रत्येक प्राणी के प्राण का अवरोध कर दिया। पश्चात् समस्त देवताओं ने श्रीहनुमानजी को विविध वरदान देकर पवनदेव को प्रसन्न किया। उसी समय इन्द्र ने श्रीहनुमान जी के शरीर को वज्र से अभेद्यता का वरदान देकर उनका हनुमान् नामकरण कर दिया। यह कथा वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड के ३५ तथा ३६वें सर्ग में विस्तार से वर्णित है। यथा उर बिशाल भुजदंड चंड नख बज्र बज्रतन (ह.बा. २)।

हनुमान जी के स्मरण से कुमति का निवारण होता है अथवा कुमतिपूर्ण खलका वे संहार करते हैं तथा सुमतिवान् सज्जनकी सहायता। जैसे कुमति रावण के विनाश में वे मुख्य भूमिका निभाते हैं –

तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥

– रा.च.मा. ५-४०-७

उसके विनाश के लिए दशमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो (ह.बा. ८) और सुमति विभीषण को सहायता कर उन्हें अविचल राज्य दिला दिया। यथा जयति भुवनैकभूषण विभीषणवरद (वि.प. २६-६)।