Chaupai 01


॥ श्रीराम ॥

मूल (चौपाई) –

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीश तिहुँ लोक उजागर॥ १ ॥

शब्दार्थ – उजागर (उज्जागर) – प्रसिद्ध।

अर्थ – समस्त शास्त्रीय ज्ञान एवं गुणों के समुद्र श्रीहनुमान जी आपकी जय हो। हे तीनों लोकों में प्रसिद्ध वानरों में श्रेष्ठ आञ्जनेय आपकी जय हो।

व्याख्या – इस चौपाई के पूर्वार्ध में श्रीहनुमान जी के पारलौकिक उत्कर्ष तथा उत्तरार्ध में लौकिक आदर्श का वर्णन करते हैं। श्रीहनुमान जी समस्त शास्त्रों के ज्ञाता हैं। श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के किष्किन्धा काण्ड में भगवान् श्रीराम इनके अलौकिक ज्ञान की प्रशंसा करते हैं –

नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः।
नासामवेदविदुषः शक्यमेवं प्रभाषितुम्॥
नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन विधिना श्रुतम्।
बहुव्याहरताऽनेन न किञ्चिदपशब्दितम्॥

– वा.रा. ४-३-२८,२९

श्रीरामचन्द्र जी प्रशंसा के स्वर में कहते हैं कि जिसने ऋग्वेद की पूर्ण शिक्षा नहीं पाई तथा जिसने यजुर्वेद को अर्थतः धारण नहीं किया तथा जो सामवेद का विद्वान् नहीं, वह इस प्रकार का भाषण कभी भी नहीं कर सकता। निश्चित ही सम्पूर्ण व्याकरण इसने विधिवत् सुना है क्योंकि धाराप्रवाह से बोलता हुआ यह विद्यार्थी कहीं भी एक भी अक्षर अशुद्ध नहीं बोला।

हनुमान जी रुद्रावतार होने से तथा जल, थल एवं नभ में अव्याहत गति होने के कारण तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं। जय कपीश – हनुमानजी कपियों के ईश्वर हैं। यथा वानराणामधीशं (रा.च.मा. सु.कां. मं.श्लो. ३)। श्रीरामजी की सेवा के लिए वानर-शरीर धारण किया क्योंकि उनके स्वामी नर-वेश में अवतार लिए तुमहिं लागि धरिहउँ नरबेशा (रा.च.मा. १-१८७-१)। स्वामी से सेवक को निम्न कक्षा में होना चाहिए। यथा –

जेहि शरीर रति राम सों सोइ आदरहि सुजान।
रुद्र देह तजि नेह बश बानर भे हनुमान॥

– दो. १४२

यद्यपि और देवों को ब्रह्मा जी ने वानर रूप में अवतार लेने का आदेश दिया था। यथा –

निज लोकहि बिरंचि गे देवन इहइ सिखाइ।
बानर तनु धरि धरनि महँ हरि पद सेवहु जाइ॥

– रा.च.मा. १-१८७

पर महादेवको आदेश नहीं दिया था, अतः देवन इहइ सिखाइ कहा न तु महादेवहि। वानर शरीर धारण करने में दूसरा हेतु यह भी है कि वानर शुद्ध शाकाहारी होता है। अर्थात् वन्य फल, मूल, पत्तों से ही अपनी जीविका चलाता है जो श्रीराघव को बहुत प्रिय है। यथा –

(१) फलमूलाशिनौ दान्तौ (रा.र.स्तो. १८)

(२) शाकप्रियः पार्थिवः

(३) न मांसं राघवो भुङ्क्ते (वा.रा. ५-३६-४१) अर्थात् राघव मांस कभी नहीं खाते हैं। अतः प्रभु की वृत्ति के अनुसार श्रीहनुमान जी ने विशुद्ध शाकाहारी वानर शरीर धारण किया। अतः हनुमान जी के उपासक भावुक भक्तों को कभी भी मांस-मत्स्य तथा मद्यका सेवन नहीं करना चाहिए। मांसाहारी उपासक निश्चित ही हनुमान जी के कोप का भाजन बनता है।