पद ०४५


॥ ४५ ॥
श्रीधर श्रीभागवत में परम धरम निरनय कियो॥
तीनि कांड एकत्व सानि कोउ अग्य बखानत।
कर्मठ ज्ञानी ऐंचि अर्थ को अनरथ बानत॥
परमहंस संहिता बिदित टीका बिस्तार्यो।
षट सास्त्र अविरुद्ध वेद संमत हि बिचार्यो॥
परमानन्द प्रसाद ते माधो स्वकर सुधार दियो।
श्रीधर श्रीभागवत में परम धरम निरनय कियो॥

मूलार्थश्रीधराचार्यजीने श्रीमद्भागवतजीमें परमधर्मका निर्णय किया। अर्थात् परमधर्म कहते किसे हैं, यह उन्होंने श्रीमद्भागवतमें बताया। जैसा कि भागवतजीके प्रथमस्कन्धके प्रथम अध्यायके द्वितीय श्लोकमें वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गलाचरणका भगवान् वेदव्यास आख्यान करते हैं –

धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां
वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्।
श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः
सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात्॥

(भा.पु. १.१.२)

अर्थात् इन महामुनि श्रीनारायण द्वारा प्रकट किये हुए श्रीमद्भागवतजीमें परमधर्मका निर्णय हुआ है। परमधर्म है क्या? तो वहाँ वेदव्यासजी कहते हैं – प्रोज्झित्कैतवः अर्थात् जहाँ कैतव नहीं है या किसी प्रकारका कपट नहीं है। परन्तु श्रीधराचार्यजी इसकी टीका करते हुए कहते हैं – प्रशब्देन मोक्षाभिसन्धिरपि निरस्तः (भा.पु.श्री.टी. १.१.२) – अर्थात् ‘प्र’उपसर्गके बलसे यहाँ मोक्षकी अभिसन्धि भी समाप्त कर दी गई है, अर्थात् ऐसा भगवद्भजन या भगवत्प्रेम जहाँ व्यक्ति मोक्षको भी नहीं चाहता। यही है परमधर्मका निर्णय। कुछ अज्ञानी लोग तीनों काण्डोंको मिलाकर एकत्वकी बात करते हैं। ज्ञानी और कर्मकाण्डी अपने-अपने अनुसार अर्थको खींचकर अनर्थकी व्याख्या करते रहते हैं। यह भागवतमें संदेह हो जाता है, अत एव श्रीधराचार्यजीने इस परमहंससंहितामें प्रसिद्ध टीका भावार्थ­दीपिकाका विस्तार किया और छहों दर्शनों अर्थात् सांख्य, योग, वैशेषिक, न्याय, पूर्वमीमांसा, और उत्तरमीमांसासे अविरुद्ध वेदसम्मत सिद्धान्तका विचार किया। श्रीधराचार्यके सद्गुरुदेव भगवान् परमानन्दजी महाराजके प्रसादसे स्वयं भगवान् विन्दुमाधवने अपने करकमलसे इस टीकाको सुधारा और हस्ताक्षर किया। इस प्रकार श्रीधराचार्यजीने भावार्थ­दीपिका अथवा श्रीधरी नामक टीका लिखकर परमधर्मका निर्णय किया।

इनके संबन्धमें एक आख्या सुनी जाती है कि श्रीधराचार्यजीके पिता निष्किञ्चन ब्राह्मण थे। श्रीधराचार्यजीकी माता जब गर्भवती थीं, अर्थात् श्रीधराचार्यजी जब माताके गर्भमें थे, तो वे वनमें रह रहीं थीं। प्रातःकालका समय था। श्रीधराचार्यके पिताजी नित्य­नियमके लिये नदी­तटपर चले गए। उसी समय एक सिंह आया और उसने श्रीधराचार्यजीकी माताको फाड़कर फेंक दिया, उन्हें खा गया और गर्भके बालकको छोड़ गया। श्रीधराचार्यके पिताने आकर देखा और कहा – “भगवन्! मैं इसकी कैसे रक्षा करूँगा?” और तब उन्होंने एक श्लोक पत्तेपर लिखकर श्रीधराचार्यके हाथमें बाँध दिया। वह श्लोक इस प्रकार है –

येन शुक्लीकृता हंसाः शुकाश्च हरितीकृताः।
मयूराश्चित्रिता येन स नो वृत्तिं विधास्यति॥

(हि. १.१७२)

अर्थात् “अरे बालक! अब मैं तुम्हारी रक्षा कैसे करूँगा? जिस परमात्माने हंसोंको श्वेत बनाया, तोतोंको हरा बनाया और मयूरोंको चित्रित बना दिया, वही परमात्मा हमारी जीविकाकी व्यवस्था करेंगे, मैं क्या करूँ?” यह कहकर श्रीधराचार्यके पिता रोते हुए दूसरे वनको चले गए और भगवत्साधना करके परमपदको प्राप्त हो गए। इधर श्रीधराचार्य रोते रहे। सहसा कुछ ही क्षणोंके पश्चात् एक ब्राह्मण दम्पती आए, उनके पास संतान नहीं थी। उन्होंने होनहार बालकको देखा और उन्हें दया आ गई। उसके हाथमें बँधे हुए पत्रको उन्होंने पढ़ लिया और तुरन्त श्रीधराचार्यको लेकर अपने घर आए और उन्हें विद्वान् बनाया। उन्हीं श्रीधराचार्यजी महाराजने श्रीमद्भागवतकी श्रीधरी नामक टीका लिखी। इस टीकाका इतना विस्तार हुआ कि पश्चात्‌के सभी आचार्योंने इसका सम्मान किया। रूप­गोस्वामी, जीव­गोस्वामी आदि सभी आचार्योंने इस टीकाका स्मरण किया है। यहाँ तक कि जब इस टीकाके संबन्धमें चर्चा आई और जब नरसिंह­मन्दिरमें, जो काशीमें आज भी प्रह्लादघाटपर विद्यमान है, टीका रख दी गई तो वहाँ भगवान्‌ने एक हस्ताक्षर करके एक श्लोक लिखा –

व्यासो वेत्ति शुको वेत्ति राजा वेत्ति न वेत्ति वा।
तत्सर्वं श्रीधरो वेत्ति श्रीनृसिंहप्रसादतः॥

अर्थात् भागवतके रहस्यको या तो व्यासजी जानते हैं या शुकाचार्यजी जानते हैं। राजा परीक्षित् जानते हैं या नहीं जानते हैं, यह कहा नहीं जा सकता क्योंकि भागवत सुननेपर उनकी तुरन्त परमपदप्राप्ति हो गई। परन्तु श्रीधरके संबन्धमें यह कहा जा सकता है कि श्रीनरसिंह भगवान्‌के प्रसादसे श्रीधर वह सब कुछ जानते हैं जो वेदव्यास जानते हैं और शुकाचार्यजी जानते हैं। भाव यह है कि नरसिंह भगवान्‌के प्रसादसे यह टीका इतनी उत्तम है कि श्रीधर भागवतका रहस्य जानते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। इसीलिये श्रीधराचार्य अपनी टीकाके मङ्गलाचरणमें नरसिंहका स्मरण करते हैं –

वागीशा यस्य वदने लक्ष्मीर्यस्य च वक्षसि।
यस्यास्ते हृदये संवित्तं नृसिंहमहं भजे॥

(भा.पु.श्री.टी.म. २)

और आगे श्रीधर गुरु और गोविन्द दोनोंका स्मरण करते हैं। वे कहते हैं –

मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्॥

(भा.पु.श्री.टी.म. ६)

अर्थात् जिनकी कृपा मूकको वाचाल अर्थात् वाणीसे अलङ्कृत कर देती है, पङ्गुको पर्वत लँघवा देती है, ऐसे गुरुदेव परमानन्दजीके साथ विराजमान माधवको मैं वन्दन करता हूँ। परमानन्देन सह माधवः परमानन्दमाधवः तं परमानन्दमाधवम्

श्रीधराचार्य मूलतः श्रीरामभक्त हैं, इसीलिये वे सर्वप्रथम मङ्गलाचरण करते हैं –

ॐ नमो भगवते श्रीपरमहंसास्वादित­चरणकमल­चिन्मकरन्दाय
भक्तजन­मानस­निवासाय श्रीरामचन्द्राय।

(भा.पु.श्री.टी.म.)

ऐसे श्रीधराचार्यजीने परमधर्मका निर्णय श्रीभागवतमें किया है।

अब नाभाजी बिल्वमङ्गलका वर्णन करते हैं, वे कहते हैं –